डोनाल्ड ट्रंप और फ्रेडरिक मर्ज़ की जुगलबंदी ने ईरान की परमाणु जिद पर दुनिया को चौंका दिया

डोनाल्ड ट्रंप और फ्रेडरिक मर्ज़ की जुगलबंदी ने ईरान की परमाणु जिद पर दुनिया को चौंका दिया

ईरान का परमाणु कार्यक्रम अब सिर्फ मिडिल ईस्ट की सिरदर्दी नहीं रहा। ये ग्लोबल सिक्योरिटी के लिए एक जलता हुआ सवाल बन चुका है। जर्मनी के चांसलर पद के प्रबल दावेदार फ्रेडरिक मर्ज़ ने हाल ही में जो रुख अपनाया है, उसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति के गलियारों में खलबली मचा दी है। मर्ज़ ने साफ कर दिया कि ईरान के पास परमाणु हथियार होने का मतलब है पूरी दुनिया के लिए मौत का वारंट। सबसे दिलचस्प बात ये है कि उनके सुर अब सीधे तौर पर डोनाल्ड ट्रंप की 'मैक्सिमम प्रेशर' पॉलिसी से मिलते दिख रहे हैं। ये बदलाव मामूली नहीं है। ये यूरोप की उस पुरानी, नरम विदेश नीति के अंत का संकेत है जिसने सालों तक तेहरान को बातचीत की मेज पर उलझाए रखा।

ईरान के खिलाफ क्यों बदल रही है जर्मनी की सोच

दशकों से जर्मनी और ईरान के बीच व्यापारिक रिश्ते रहे हैं। बर्लिन हमेशा से डिप्लोमेसी के जरिए हल निकालने का पक्षधर रहा। लेकिन अब फ्रेडरिक मर्ज़ का बयान एक बड़ी शिफ्ट को दिखाता है। मर्ज़ जानते हैं कि अगर ईरान ने यूरेनियम संवर्धन की अपनी सीमा पार की, तो सऊदी अरब और तुर्की जैसे देश भी इसी रेस में कूद पड़ेंगे। फिर आप ग्लोबल नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी को रद्दी की टोकरी में फेंक सकते हैं।

मर्ज़ का ये कहना कि ट्रंप के साथ मिलकर काम करना जर्मनी की मजबूरी नहीं बल्कि जरूरत है, एक कड़ा संदेश है। वो समझ चुके हैं कि जो बाइडन की सुस्त नीतियों ने ईरान को सिर्फ वक्त दिया है। ट्रंप का तरीका शायद कुछ लोगों को सख्त लगे, लेकिन मर्ज़ को इसमें एक स्पष्टता दिखती है। तेहरान को ये पता होना चाहिए कि अगर वो हद पार करेंगे, तो उन्हें सिर्फ प्रतिबंधों का नहीं बल्कि सैन्य विकल्पों का भी सामना करना पड़ सकता है।

डोनाल्ड ट्रंप और मर्ज़ की केमिस्ट्री के मायने

जब डोनाल्ड ट्रंप पहली बार राष्ट्रपति बने थे, तब जर्मनी के साथ उनके रिश्ते काफी तल्ख थे। एंजेला मर्केल के साथ उनकी अनबन जगजाहिर थी। लेकिन फ्रेडरिक मर्ज़ वो नेता नहीं हैं। वो एक बिजनेस माइंडसेट वाले नेता हैं जो अमेरिका की 'पीस थ्रू स्ट्रेंथ' वाली थ्योरी को समझते हैं। ट्रंप ने अपने पिछले कार्यकाल में 2015 की परमाणु डील (JCPOA) को एक "घटिया समझौता" बताकर उससे हाथ खींच लिए थे। तब यूरोप ने उनकी आलोचना की थी।

आज हालात अलग हैं। यूक्रेन युद्ध ने यूरोप को सिखा दिया है कि कमजोरी की कीमत क्या होती है। मर्ज़ अब उसी भाषा में बात कर रहे हैं जिसे ट्रंप पसंद करते हैं। वो चाहते हैं कि जर्मनी अपनी रक्षा जरूरतों के लिए अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय खुद को मजबूत करे और साझा दुश्मनों पर एक जैसा रुख अपनाए। ईरान इस लिस्ट में सबसे ऊपर है।

परमाणु हथियारों की रेस और तेहरान की चालबाजी

ईरान अक्सर कहता है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की रिपोर्टें कुछ और ही कहानी बयां करती हैं। 60% तक संवर्धित यूरेनियम का बिजली बनाने में कोई काम नहीं होता। ये सीधा बम बनाने की तैयारी है।

मर्ज़ ने इशारों में कहा कि ईरान के पास परमाणु हथियार होने का मतलब है इजरायल का अस्तित्व खतरे में पड़ना। जर्मनी के लिए इजरायल की सुरक्षा उसकी 'रीजन ऑफ स्टेट' (Staatsräson) है। अगर ट्रंप वापस आते हैं और मर्ज़ जर्मनी के चांसलर बनते हैं, तो आप तेहरान पर अब तक का सबसे कड़ा शिकंजा कसते हुए देखेंगे। ये सिर्फ आर्थिक प्रतिबंधों तक सीमित नहीं रहेगा। इसमें ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) को पूरी तरह अलग-थलग करना भी शामिल होगा।

क्या यूरोप अब अमेरिका के पीछे चलेगा

यूरोपीय संघ के कई देश अभी भी डरे हुए हैं। उन्हें लगता है कि ट्रंप के साथ हाथ मिलाने से उनके ईरान के साथ बचे-खुचे व्यापारिक संबंध खत्म हो जाएंगे। लेकिन मर्ज़ का विजन बड़ा है। वो जर्मनी को यूरोप के एक पिछलग्गू देश से निकालकर एक निर्णायक खिलाड़ी बनाना चाहते हैं।

  • ईरान को मिलने वाली फंडिंग के रास्ते बंद करना।
  • बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम पर बिना शर्त पाबंदी।
  • हूती और हिजबुल्लाह जैसे प्रॉक्सी संगठनों को मिलने वाली मदद पर चोट।

ये वो मुद्दे हैं जिन पर मर्ज़ और ट्रंप का एजेंडा बिल्कुल एक जैसा है। मर्ज़ जानते हैं कि अमेरिका के बिना यूरोप अपनी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता। और अमेरिका को यूरोप में एक ऐसा साथी चाहिए जो उसकी बातों पर सिर्फ सिर न हिलाए बल्कि जमीन पर एक्शन भी ले।

सुरक्षा के नए समीकरण और भारत पर असर

ईरान और जर्मनी के इस बदलते घटनाक्रम का असर भारत पर भी पड़ेगा। भारत के लिए ईरान चाबहार पोर्ट की वजह से महत्वपूर्ण है। लेकिन अगर पश्चिमी देश ईरान पर दबाव बढ़ाते हैं, तो नई दिल्ली के लिए संतुलन बनाना मुश्किल होगा। फ्रेडरिक मर्ज़ ने साफ कर दिया है कि सुरक्षा और व्यापार को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता।

अगर आप सोचते हैं कि ये सिर्फ बयानबाजी है, तो आप गलत हैं। मर्ज़ की क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (CDU) पार्टी जर्मनी में काफी मजबूत हो रही है। उनकी बातों का वजन बढ़ रहा है क्योंकि जर्मनी की मौजूदा सरकार आर्थिक मोर्चे पर संघर्ष कर रही है। लोग एक ऐसा नेता चाहते हैं जो देश को दोबारा मजबूत बना सके।

ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को रोकने के लिए अब सिर्फ बातों से काम नहीं चलेगा। ट्रंप की वापसी की संभावनाओं ने तेहरान को पहले ही सतर्क कर दिया है। अब मर्ज़ के रूप में उन्हें यूरोप में भी एक दुश्मन दिखने लगा है। ये गठबंधन अगर हकीकत बनता है, तो 2026 तक मध्य पूर्व की पूरी राजनीति बदल जाएगी।

ईरान को अब ये चुनना होगा कि वो एक सामान्य देश की तरह रहना चाहता है या एक ऐसे परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र की तरह जिसे पूरी दुनिया ने त्याग दिया हो। मर्ज़ और ट्रंप का रुख साफ है। वो ईरान को परमाणु बम नहीं बनाने देंगे, चाहे इसके लिए उन्हें कितनी ही कड़ाई क्यों न करनी पड़े।

ईरान को अब अपनी रणनीति पर दोबारा सोचना होगा क्योंकि अब जर्मनी की तरफ से उसे वो ढाल नहीं मिलेगी जो पहले मिला करती थी। ये वैश्विक सुरक्षा के लिहाज से एक निर्णायक मोड़ है। तेहरान के लिए बेहतर होगा कि वो अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के साथ पूर्ण सहयोग शुरू करे, वरना आने वाले साल उसके लिए बेहद कठिन होने वाले हैं।

IH

Isabella Harris

Isabella Harris is a meticulous researcher and eloquent writer, recognized for delivering accurate, insightful content that keeps readers coming back.